Friday, February 25, 2011

पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा संकट हिंदू ही झेल रहे हैं।

पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा संकट हिंदू ही झेल रहे हैं। मानवाधिकार संबंधी एक नई रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश, पाकिस्तान, मलेशिया और सऊदी अरब सहित दुनियाभर के कई देशों में रहने वाले हिंदू रोजाना भेदभाव, पीड़ा और खतरे के साए में अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं।
स्वयंसेवी संगठन ‘हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन’ (एचएएफ) द्वारा आज यहां जारी की गई ‘दक्षिण एशिया और विदेशों में हिंदू: मानवाधिकार सर्वे 2007’ नामक इस रिपोर्ट में दस देशों में हिंदुओं के जीवन स्तर का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बांग्लादेश में सरकार बदलने के बावजूद वर्ष 2007 के पहले छह महीनों में हिंदुओं की हत्या, बलात्कार और मंदिर तोड़ने जैसी 270 घटनाएं दर्ज की गई हैं। वहीं पाकिस्तान में भी हिंदुओं के खिलाफ बंधुआ मजदूरी, अपहरण और महिलाओं के जबरन धर्म परिवर्तन जैसे कई अपराध घटित हुए हैं।
रिपोर्ट को जारी किए जाने के अवसर पर सीनेटर फ्रैंक आर. लाउटेनबर्ग ने कहा, “हम सभी के मूल्य एक समान हैं। हमें सभी लोगों उनकी संस्कृतियों और आस्थाओं का सम्मान करना चाहिए लेकिन यह रिपोर्ट बताती है कि अभी भी ढेरों कमियां मौजूद हैं”। रिपोर्ट लॉन्गवुड विश्वविद्यालय में संचार विभाग के अध्यक्ष डॉक्टर रमेश राव के नेतृत्व में तैयार की गई।
हिंदुओं पर अत्याचार के मलेशिया में तमाम उदाहरण है। मसलन मलेशिया के पेराक राज्य के तूपाह एस्टेट में रहने वाले तमिल हिंदुओं ने श्मशान भूमि को कृषि भूमि में परिवर्तित कर दिए जाने का विरोध किया है। विरोध के लिए उन्होंने शांतिपूर्ण प्रदर्शन का सहारा लिया। एस्टेट में रहने वाले एम. मरिमुथु ने दावा किया कि भारतीय समुदाय पिछले 90 सालों से इस भूमि का प्रयोग अपने लोगों के अंतिम संस्कार के लिए कर रहा था। उन्होंने कहा, “कुछ गैरजिम्मेदार किस्म के लोगों ने जमीन पर कब्जा कर लिया है और उसके मालिकाना हक का दावा करने लगे हैं”।

नेपाल तो अब हिंदू राष्ट्र रहा नहीं और मलेशिया में हिंदुओं पर कानूनी अत्याचार भी थमा नहीं है जबकि ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शहर के नेलसन इलाके के नागरिकों ने स्वामी नारायण संस्था द्वारा प्रस्तावित एक हिन्दू मंदिर के निर्माण का विरोध किया गया। स्थानीय लोगों का तर्क है कि मंदिर के निर्माण के कारण इस क्षेत्र में पार्किग और इमारतों का डिजाइन प्रभावित होगा। इससे पहले इस इलाके में एक मुस्लिम स्कूल के खिलाफ भी लोग एकजुट हो गए थे। संस्था के ट्रस्टी करसन कराई ने बताया कि दरअसल लोग हिन्दू मंदिर को लेकर भ्रमित हैं और फिजूल के सवाल उठा रहे हैं। इस इलाके में हिन्दू मंदिर के निर्माण से स्थानीय सुविधाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

संस्था ने 10 लाख ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की लागत से इस इलाके में एक हिन्दू मंदिर के निर्माण की योजना बनाई है, लेकिन स्थानीय नागरिक मंदिर के डिजाइन और पार्किंग को लेकर इसका विरोध कर रहे है।इससे पहले स्वामी नारायण संस्था कई देशों में भव्य मंदिरों का निर्माण कर चुकी है। गौरतलब है कि लंदन के नेस्डन इलाके में बनाया गया हिन्दू मंदिर ब्रिटिश हिन्दूओं में काफी लोकप्रिय है। हॉल ही में इस संस्था ने अटलांटा और टोरंटो में भी भव्य हिन्दू मंदिरों का निर्माण किया है। 

Tuesday, February 15, 2011

आरुषि हत्याकांड : कमजोर हुई सीबीआई

सारी जांच एजेंसियों के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो के हाथ खड़े करने के बावजूद अदालत ने अगर आरुषि हत्याकांड मामले को जिंदा रखा है, तो यह स्वागतयोग्य फैसला है। जांच एजेंसियों के घालमेल और मुजरिमों की अत्यधिक चालाकी से मामला जरूर ऐसी जगह पहुंच गया है कि हत्यारों की पहचान और सजा देना आसान नहीं रहेगा, लेकिन जिस तरह से सीबीआई मामले को रफा-दफा करने जा रही थी, वह तो और भी गलत था। ब्यूरो ने अपनी जांच से शक की सूई तलवार दंपति की तरफ मोड़कर भी यही कह दिया कि वह जांच आगे बढ़ाने की स्थिति में नहीं है। ब्यूरो और उसके पहले उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा बार-बार रुख बदलने और जांच की दिशा उलटने-पलटने से केस कमजोर जरूर हो गया है।

तलवार दंपति ने भी जाने-अनजाने काफी सारे सुबूत मिटाए और उनकी सूचना पर जांच ‘गुमराह’ भी हुई। कई बार तो साफ लगा कि अपने नौकर हेमराज के साथ पड़ोस के तीन नौकरों को फंसाने का प्रयास किया गया। पर अब अदालत के फैसले के बाद ये तीनों चैन की सांस ले सकेंगे और उनके ऊपर आई कालिख भी काफी हद तक धुल गई है। उन लोगों के दोषी या निर्दोष होने का मसला भी बड़ा था, लेकिन मुख्य बात इस 14 वर्षीय किशोरी की मौत की है। उसकी मौत और जांच के सारे प्रकरण को दोहराने की जरूरत नहीं है, लेकिन जिन नौ मुद्दों को अदालत ने महत्वपूर्ण मानकर मुकदमा चलाने लायक माना है, वे पर्याप्त वजनदार हैं। इनके आधार पर सुबूत नष्ट करने, अपराध के लिए साजिश रचने जैसे मामले तो ठहरेंगे ही और फिर हत्या के पीछे की मंशा भले अस्पष्ट लगे, हत्या का मामला बनेगा ही, क्योंकि कोई यों ही सुबूत नष्ट नहीं करेगा।

यह काम उस लड़की के यौनांगों की सफाई से लेकर कमरे की सफाई, खून लगे कपड़े हटाने, मोबाइल से सूचनाएं निकालने तक गया है। जांच की दिशा को भटकाने का मामला अपनी जगह है। अब ये आधार किसी को सजा दिलाने और आरुषि मामले में न्याय दिलाने का आधार बनेंगे या नहीं, यह कहना जल्दबाजी होगा। पर अदालत के ताजा फैसले के बाद चीजें वापस पटरी पर आई हैं। सीबीआई भले ही इसे अपनी ‘जीत’ बताए, असल में यह उसके कामकाज पर एक गंभीर टिप्पणी है और उसे नए सिरे से जांच और अदालती कामकाज को अंजाम तक पहुंचाने के लिए लगना होगा। अब उसके लिए कोई अगर-मगर करना भी मुश्किल होगा, क्योंकि सारे मुल्क की निगाहें उस पर लगी हुई हैं। तलवार दंपती के लिए बचाव के सारे रास्ते बंद हो गए हों या वे ही अपनी बेटी के हत्यारे घोषित हो गए हों, यह मानना गलत होगा। पर इसमें कोई शक नहीं कि अब उन लोगों की मुश्किलें काफी बढ़ गई हैं।

Wednesday, January 12, 2011

स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है-------------------------------

स्वामी विवेकानंद जी  ने कहा है--------------------------------


"पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान।' ध्यान के द्वारा ही हम इंद्रियों पर संयम रख सकते हैं। शम, दम और तितिक्षा अर्थात मन को रोकना, इन्द्रियों को रोकने का बल, कष्ट सहने की शक्ति और चित्त की शुद्धि तथा एकाग्रता को बनाए रखने में ध्यान बहुत सहायक होता है।"



"मानव-देह ही सर्वश्रेष्ठ देह है, एवं मनुष्य ही सर्वोच्च प्राणी है, क्योंकि इस मानव-देह तथा इस जन्म में ही हम इस सापेक्षिक जगत् से संपूर्णतया बाहर हो सकते हैं–निश्चय ही मुक्ति की अवस्था प्राप्त कर सकते हैं, और यह मुक्ति ही हमारा चरम लक्ष्य है।"



"जो मनुष्य इसी जन्म में मुक्ति प्राप्त करना चाहता है, उसे एक ही जन्म में हजारों वर्ष का काम करना पड़ेगा। वह जिस युग में जन्मा है, उससे उसे बहुत आगे जाना पड़ेगा, किन्तु साधारण लोग किसी तरह रेंगते-रेंगते ही आगे बढ़ सकते हैं।"



"जो महापुरुष प्रचार-कार्य के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं, वे उन महापुरुषों की तुलना में अपेक्षाकृत अपूर्ण हैं, जो मौन रहकर पवित्र जीवनयापन करते हैं और श्रेष्ठ विचारों का चिन्तन करते हुए जगत् की सहायता करते हैं। इन सभी महापुरुषों में एक के बाद दूसरे का आविर्भाव होता है–अंत में उनकी शक्ति का चरम फलस्वरूप ऐसा कोई शक्तिसम्पन्न पुरुष आविर्भूत होता है, जो जगत् को शिक्षा प्रदान करता है।"



"आध्यात्मिक दृष्टि से विकसित हो चुकने पर धर्मसंघ में बना रहना अवांछनीय है। उससे बाहर निकलकर स्वाधीनता की मुक्त वायु में जीवन व्यतीत करो।"



"मुक्ति-लाभ के अतिरिक्त और कौन सी उच्चावस्था का लाभ किया जा सकता है? देवदूत कभी कोई बुरे कार्य नहीं करते, इसलिए उन्हें कभी दंड भी प्राप्त नहीं होता, अतएव वे मुक्त भी नहीं हो सकते। सांसारिक धक्का ही हमें जगा देता है, वही इस जगत्स्वप्न को भंग करने में सहायता पहुँचाता है। इस प्रकार के लगातार आघात ही इस संसार से छुटकारा पाने की अर्थात् मुक्ति-लाभ करने की हमारी आकांक्षा को जाग्रत करते हैं।"



"हमारी नैतिक प्रकृति जितनी उन्नत होती है, उतना ही उच्च हमारा प्रत्यक्ष अनुभव होता है, और उतनी ही हमारी इच्छा शक्ति अधिक बलवती होती है।"



"मन का विकास करो और उसका संयम करो, उसके बाद जहाँ इच्छा हो, वहाँ इसका प्रयोग करो–उससे अति शीघ्र फल प्राप्ति होगी। यह है यथार्थ आत्मोन्नति का उपाय। एकाग्रता सीखो, और जिस ओर इच्छा हो, उसका प्रयोग करो। ऐसा करने पर तुम्हें कुछ खोना नहीं पड़ेगा। जो समस्त को प्राप्त करता है, वह अंश को भी प्राप्त कर सकता है।"



"पहले स्वयं संपूर्ण मुक्तावस्था प्राप्त कर लो, उसके बाद इच्छा करने पर फिर अपने को सीमाबद्ध कर सकते हो। प्रत्येक कार्य में अपनी समस्त शक्ति का प्रयोग करो।"


"सभी मरेंगे- साधु या असाधु, धनी या दरिद्र- सभी मरेंगे। चिर काल तक किसी का शरीर नहीं रहेगा। अतएव उठो, जागो और संपूर्ण रूप से निष्कपट हो जाओ। भारत में घोर कपट समा गया है। चाहिए चरित्र, चाहिए इस तरह की दृढ़ता और चरित्र का बल, जिससे मनुष्य आजीवन दृढ़व्रत बन सके।"



"संन्यास का अर्थ है, मृत्यु के प्रति प्रेम। सांसारिक लोग जीवन से प्रेम करते हैं, परन्तु संन्यासी के लिए प्रेम करने को मृत्यु है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम आत्महत्या कर लें। आत्महत्या करने वालों को तो कभी मृत्यु प्यारी नहीं होती है। संन्यासी का धर्म है समस्त संसार के हित के लिए निरंतर आत्मत्याग करते हुए धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जाना।"

Sunday, December 19, 2010

हिन्दू हिंसक होता तो ......................{आप सभी लोग ध्यान से पढो ...}

हिन्दू हिंसक होता तो ..............
तो भारत में मुसलमान नही होते .
तो भारत पर विदेशी हुकूमत नही होती 
तो भारत में एक भी मस्जित या चर्च नही होता 
तो भारत में कब्रस्तन नही होता 
तो भारत अमेरिका से आगे होता 
तो भारत खुशाल होता 
तो भारत में अपराध नही होता 
तो भारत में सोनिया नही होती
तो पाकिस्तान नही होता 
तो भारत में गंदगी नही होती 
तो भारत में गऊ हत्या नही होती 
तो भारत में नारी का सम्मान होता 
तो अयोध्या में दिव्य और भव्य राम मंदिर होता 
तो ताजमहल में शिव मंदिर होता 
तो जामा मस्जित में अखंड रामायण होती 
तो काठ मुल्ले दिन में पांच बार चीखते नही 
तो कांग्रेस नही होती 
तो कश्मीर में हिन्दी पिटता  नही 
तो भारत में विश्व शक्ति होता 
तो भारत में गरीब नही होते 
तो भारत में भीड़ नही होती 
तो भारत में ...............
शेष ....... आगे 

Saturday, December 4, 2010

अच्छे नागरिक क्यों नहीं बन पा रहे हम

विदेशी तो कहते 
भारत का एक बड़ा तबका भी 
शिद्दत से महसूस करने लगा है कि 
हमारे देश के लोगों में सिविक सेंस 
का अभाव है। हेल्थ और हाइजीन 
को लेकर उनमें जागरूकता की 
कमी है। ऐसा नहीं है कि यह चिंता 
विदेशी सर्वेक्षणों से उपजी है। सर्वे  
विदेशी सर्वेक्षणों से उपजी है। सर्वे 
तो पहले भी होते ही रहे हैं , जिनमें 
अक्सर हमें गंदा , पिछड़ा , भ्रष्टआदि बताया जाता है। इनसर्वेक्षणों के निष्कर्षों से विचलिततो हम पहले भी नहीं होते थे ,
घर का कूड़ा सड़क पर 
अब जैसे लोग शहरों में सोसाइटी बनाकर रहने लगे हैं , लेकिन कूड़ा वे सड़क परही फेंकेंगे। पोंछे का गंदा पानी रास्ते पर ही डाल देंगे। जब चाहेंगे अपनी मर्जी सेजोर - जोर से गाना बजाने लगेंेगे। बारात निकलेगी तो लोग बीच सड़क पर हीडांस शुरू कर देंगे , इस बात की परवाह किए बिना कि दूसरों को कोई दिक्कत होरही है। सड़कें चौड़ी - चौड़ी बनने लगी हैं , लेकिन उन पर आधुनिक महंगीगाडि़यों में सवार लोग न तो लेन की परवाह करेंेगे , न गति सीमा की। पैदलयात्रियों को इससे कोई मतलब नहीं कि लाइट लाल है या हरी , वे जब चाहेंगेसड़क पार करना शुरू कर देंेगे। मेट्रो जैसी आधुनिक सुविधा लोगों को चाहिए ,लेकिन उनमें चढ़ने के लिए कतार में खड़े होने का धैर्य कोई नहीं दिखाता। हरकोई एक - दूसरे को धकिया कर आगे निकलने के चक्कर में रहता है। खुले मेंपेशाब करना , थूक फेंकना , नाक छिड़कना और फलों के छिलके , गुटकों के पाउचआदि कहीं भी फेंक देना तो आम बात है। 

कॉमनवेल्थ गेम्स में आए मेहमानों ने जब खेलगांव के इंतजाम की आलोचना कीतो हमें बुरा लगा। कुछ अधिकारियों ने यह कह कर बचाव करने की कोशिश कीकि हाइजीन के उनके और हमारे मानकों में फर्क है। ठीक है कि भौगोलिक परिवेशमें भिन्नता के कारण कुछ चीजों में अंतर हो सकता है , लेकिन हमारा कोई तोमानक होगा। आखिर साफ - सफाई , यातायात , नागरिक जीवन का भारतीयमानक क्या है ? इसका उत्तर किसी के पास नहीं है।

स्वच्छता का अजेंडा 
सच कहा जाए तो यह न तो सरकार के लिए , न ही समाज के लिए कोई बड़ाअजेंडा रहा है। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि हमारे नेताओं ने सामाजिक जीवनके सवालों को राष्ट्रीयता से नहीं जोड़ा , जैसा कि अनेक विकासशील देशों में जोड़ागया। वियतनाम का उदाहरण लें। उसके नैशनल लीडर हो ची मिन्ह ने साफ -सफाई को राजनीतिक चेतना और देशभक्ति का एक अभिन्न अंग बनाया। खुद होची मिन्ह जब मौका मिलता , सड़कों पर झाड़ू लगाने निकल पड़ते थे। भारत मेंकेवल गांधी ने इस बात को महसूस किया था , लेकिन वह बेहतर नागरिक जीवनके अजेंडे को राजनीतिक मुक्ति के स्वप्न से जोड़ने में विफल रहे। वह कांग्रेस को इससवाल पर साथ नहीं ले पाए। कांग्रेस के लिए सामाजिक अजेंडा कभी महत्वपूर्णनहीं रहा। उसने इसे अपने कार्यक्रम के रूप में स्वीकार तो किया , पर इस परगंभीरता से अमल नहीं किया। पार्टी के ज्यादातर नेता गांधीजी की साफ - सफाईकी बातों को उनका स्टंट या उनकी निजी सनक ही मानते रहे। 

आधुनिक दृष्टि के समर्थक नेहरू ने भी नागरिक जीवन के मुद्दे को महत्व नहींदिया। असल में उन्हें और दूसरे नेताओं को लगता रहा कि आजादी पाने के बादसब कुछ अपने आप ठीक हो जाएगा। वह यह नहीं समझ पाए कि स्वतंत्रताहासिल करने के बाद राष्ट्र को मजबूत बनाने के लिए हमें एक बेहतर नागरिकसमुदाय की भी जरूरत पड़ेगी। कुछ और नेताओं को लगता रहा कि भारत जैसेगरीब देश के लिए तो पहले भूख मिटाना सबसे बड़ा मुद्दा है , सफाई और नागरिकजीवन की बात तो बाद में आती है। शायद इसलिए आजादी के बाद भीवामपंथियों या दूसरी धाराओं के जनांदोलन में भी इसे मुद्दा नहीं बनाया गया।

सरकार या दुश्मन 
आजादी के आंदोलन के दौरान सत्ता से असहयोग और नियम तोड़ने को एकहथियार की तरह नेताओं ने इस्तेमाल किया। आजादी हासिल करने के बाद भीलोगों में इसकी स्मृति समाप्त नहीं हुई और कमोबेश आज भी बनी हुई है। सरकारको अपने शत्रु या खलनायक की तरह देखने का भाव आज भी जीवित है। नियमोंका उल्लंघन कहीं न कहीं उसी भाव की अभिव्यक्ति है। देश में जिस किसी कोअपनी कोई मांग मनवानी होती है , वह सबसे पहले सड़क जाम कर आमनागरिकों का चलना - फिरना मुश्किल बना देता है। उसके बाद वह सार्वजनिकसंपत्ति को अपना निशाना बनाता है। दुर्भाग्य से सरकारी एजेंसियां जनता काविश्वास अर्जित करने में विफल रही हैं। इस कारण उन्हें लोगों का सहयोग नहींमिल पाता। 

संतुलित नागरिक जीवन के लिए जरूरी है कि नागरिकों में एक हद तक समानताका भाव भी हो , लेकिन भारत में जिस तरह जाति , प्रांत और धर्म की राजनीतिहुई है , उससे लोगों के जेहन में इतनी दीवारें खिंच गई हैं कि उनमें आपसीसहयोग की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो पाती। उनमें आर्थिक और शैक्षिक असंतुलनभी है। शहरों में रहने वाले ज्यादातर नागरिक अपने साथ गांव की स्मृति लेकरआते हैं , जो उनके अचेतन में जड़़ जमाकर बैठी रहती है। वे मन में गांव का हीपावर स्ट्रक्चर ढोते रहते हैं। 

गांव में साफ - सफाई या ट्रैफिक की वह समस्या नहीं है , जो शहरों में है। इसलिएशहरों के मापदंड से वे दिमागी तौर पर तालमेल नहीं बिठा पाते। हमने विकासका जो मॉडल चुन लिया है , उसका अभिन्न हिस्सा है - शहरीकरण। केवलइंफ्रास्ट्क्चर खड़ा करके ही शहर नहीं बसाया जा सकता। अर्बनाइजेशन के लिएनागरिकों को मानसिक तौर पर तैयार करना होगा। लेकिन यह तभी संभव है ,जब पहले हमारा नेतृत्व वर्ग इसके लिए तैयार हो। 

Tuesday, November 23, 2010

क्या खबर, क्या पता , क्या खुशी है, गम है क्या |

क्या खबर, क्या पता , क्या खुशी है, गम है क्या |
ले के अंशू जो खुशी दे , गम के बदले जो हंसी दे ,
राज यह जाना उसी ने जिन्दगी क्या है जिन्दगी |
कल की बातें भूल जा , गुजरी रातें  भूल जा , ख्वाव जो सच हो सके ना उनकी यादें भूल जा .
जो ना हरे बेबसी से ना करे सिकवा किसी  से
राज यह जाना उसी ने जिन्दगी क्या है जिन्दगी |
अपने दिल का दर्द ये उम्र भर हस के पिए जीना उसका जीना है जो औरों की खातिर जिए |
काम ले जिन्दादिली से, यूँ ही खेले जिन्द्जी से,
राज यह जाना उसी ने जिन्दगी क्या है जिन्दगी |
क्या खबर, क्या पता , क्या खुशी है, गम है क्या |

Friday, November 12, 2010

डा० उर्मिलेश जी को नमन .....हे शंखधार ................ तुम को प्रणाम है वारम्वार

बदायूं महोत्सव का भव्य उदघाटन आज !
वे वजह वोझ दिल में न सवारे रखिये ........
जिन्दगी एक जंग है इस जंग को जारी जारी रखिये .....
प्रसिद्ध  रास्ट्रीय गीतकार स्व० डा० उर्मिलेश  शंखधार जी ने बदायूं महोत्सव का सुभारम्भ कर जिले की प्रतिभाओं को एक नया मंच दिया जिससे की उनको आगे बढने का अवसर मिले .............
बदायूं महोत्सव-2010 का आयोजन डा० उर्मिलेश जी के सुपुत्र डा० अक्षत असेष जी के संयोजन में किया जा रहा है
हम भवन से कामना करते है की  डा० अक्षत जी इस काम में विजय प्राप्त करें ....
आज डा० उर्मिलेश  शंखधार जी हमारे बीच नही है
आओ आज हम सभी मिलकर बदायूं महोत्सव-2010
डा० उर्मिलेश  शंखधार जी को , उनकी कला . वाणी , रस , देश प्रेम को समर्पित करते हैं ....
और डा० उर्मिलेश जी को नमन करते हुए आज के बदायूं महोत्सव अवसर पर स्मरण करते है ....
हे काव्य कंठ ............
हे गीतकार ..............
हे  शंखधार ................
तुम को प्रणाम है वारम्वार ................